“सिस्टम की सूनी आँखें: जब 6 थानों ने ठुकराई मदद की गुहार, तो एक खुला गड्ढा बन गया मौत का फ़ंदा” जनकपुरी का कमल: बैंक कर्मचारी की रहस्यमय मौत और पुलिस-प्रशासन के संवेदनहीनता के गंभीर सवाल

दिल्ली की रौनक और चकाचौंध के पीछे छुपी है एक ऐसी क्रूर व्यवस्था, जहाँ एक जान की कीमत सिर्फ़ एक उपेक्षापूर्ण टिप्पणी है – “ऐसे लड़के रोज खोते हैं।” जनकपुरी का युवा कमल, जो रोज़ी-रोटी कमाने रात की शिफ्ट में निकला, वह घर नहीं लौटा। उसकी खोज में भटकते परिजनों ने जिस सिस्टम से मदद मांगी, उसने न केवल आँखें मूंद लीं, बल्कि एक खुले गड्ढे को उसकी क़ब्र बनने दिया।

रात का सन्नाटा, थानों का सूनापन

सोमवार की वह रात कमल के परिवार के लिए अंधकार का सफ़र बन गई। बेटे का फोन न बजने पर चिंतित माता-पिता और भाई-बहन दौड़े पुलिस के पास। पहला थाना, दूसरा, तीसरा… छह थानों (जनकपुरी, विकासपुरी, डाबड़ी समेत) के चक्कर। हर जगह एक ही राग – “शिकायत दर्ज नहीं कर सकते।” न कोई सुनवाई, न सहानुभूति, सिर्फ़ नियमों की ठंडी दीवार। और फिर सातवें थाने (सागरपुर) के एक पुलिसकर्मी का वह ज़हरीला वाक्य, जिसने उम्मीद की बची-खुची लौ भी बुझा दी – “ऐसे लड़के रोज खोते हैं।” क्या एक माँ का दिल सुन सकता है यह बात? क्या कोई व्यवस्था इतनी संवेदनशून्य हो सकती है?

सुबह का सदमा: एक गड्ढा, एक लाश, सवालों का अंबार

अगली सुबह जो खबर आई, वह किसी कोरे सनसनीखेज समाचार से कहीं ज़्यादा दर्दनाक थी। जनकपुरी के पास दिल्ली जल बोर्ड का एक गहरा, चौड़ा गड्ढा… बिना किसी बैरिकेडिंग के, बिना किसी चेतावनी के, खुला पड़ा था महीनों से। उसी में मिली कमल की बाइक और उसकी जवान लाश। वह गड्ढा सिर्फ़ पानी का नहीं, बल्कि प्रशासन की लापरवाही और ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़ने का प्रतीक बन गया। एक युवा की जान चली गई, एक परिवार टूट गया।

ग़ैर-ज़िम्मेदाराना जवाब, टूटी हुई व्यवस्था

पुलिस का दावा है कि उन्होंने मोबाइल लोकेशन ट्रैक किया। सवाल है – अगर ट्रैक किया, तो बचा क्यों नहीं पाए? और जल बोर्ड ने दुख जताकर जांच के आदेश दे दिए। लेकिन क्या जांच कमल को वापस ला सकेगी? क्या यह जांच उन अधिकारियों को सज़ा दे पाएगी, जिनकी लापरवाही ने उस गड्ढे को मौत का जाल बना दिया?

कमल की मौत कोई “दुर्घटना” नहीं, बल्कि हत्या है

एक ऐसी हत्या जिसमें हत्यारे हैं व्यवस्था की संवेदनहीनता, प्रशासन की लापरवाही और जनसेवकों का कर्तव्यहीनता। यह सवाल सिर्फ़ एक परिवार का नहीं, हर उस नागरिक का है जो रोज़ सड़कों पर निकलता है। कब तक चलेगी यह बेरुखी? कब जागेगा यह सिस्टम? कमल का खून सड़क पर नहीं, हमारे सिस्टम के हाथों से बहा है। उसके परिवार को इंसाफ़ चाहिए। हमें एक सुरक्षित और संवेदनशील शहर चाहिए।


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